Wednesday, December 10, 2008

जो अपराधी नहीं होंगे...


अमिताभ बच्चन जैसे सुपर सितारे को भी सरकारी तथा निजी सुरक्षा गार्डों से घिरे होने बावजूद जेब में पिस्तौल रखनी पड़ती है!! यह बात सामने नहीं आती, अगर मुंबई हवाई अड्डे पर उनकी पिस्तौल और उसके लाइसेंस की जानकारियां आपस में मेल खा जाती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और बात खुल गई। साफ है कि देश में आज आम हो या खास, हर कोई अपनी जान की सुरक्षा के लिए चिंतित है? दिल्ली, जयपुर, मुंबई से लेकर गुवाहाटी और बंगलूरू तक जनता सरकार से पूछ रही है कि क्या सिर्फ नेताओं को सुरक्षा की जरूरत है? जनता का क्या... जो आतंकियों के बम-बंदूकों में मरी जा रही है। सो, अब चर्चा चल पड़ी है कि क्या लोगों को पिस्तौल, बंदूक जैसे हथियारों के लाइसेंस देने के नियमों को ढीला करने का वक्त आ गया? किसी समय अंडरवल्र्ड से संबंध और अवैध हथियार रखने के मुकदमों के साये में जी रहे संजय दत्त इसके पक्ष में हैं। एक टीवी चैनल पर उन्होंने कहा है कि मैं अपने कुछ दोस्तों से मुंबई पर आतंकी हमले के बाद बात कर रहा था। सब सहमत थे कि यदि उस दिन ताज या ओबेराय में दस लोगों के पास भी निजी सुरक्षा के लिए पिस्तौल होती, तो तस्वीर बदल भी सकती थी।वाकई। परंतु किसी भी आम-ओ-खास को निजी हथियार का लाइसेंस आसानी से देने का मसला काफी टेढ़ा है। समाज में गुस्सा बढ़ रहा है। व्यक्ति के घर-दफ्तर में तनाव बढ़ गया है। गला काट प्रतिद्ंवद्विता के दौर में एक-दूसरे की असहमति सहने की कूवत कम हो रही है। क्षमा का भाव लगभग समाप्त है। ऐसे में हमारे समाज को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले फिल्मी हीरो या तो पिस्तौल लेकर चल रहे हैं या फिर उसे आसानी से मुहैया कराने की वकालत कर रहे हैं!! बंदूक और पिस्तौल का भी नशा होता है। नशा व्यक्ति को अनियंत्रित करता है। वैसे, इससे बेपरवाह चंबल में स्थित शिवपुरी शहर के प्रशासन ने इस साल एक अनोखी योजना लागू की। इलाके के जो पुरुष नसबंदी कराएंगे, उन्हें बंदूक के लाइसेंस जल्दी मिल जाएंगे!! परिणाम यह कि योजना से पहले बीते एक बरस में मात्र 8 पुरुषों ने नसबंदी कराई थी, योजना के बाद अब तक करीब 250 मर्द ऐसा करा चुके हैं। क्या यह योजना देश में जल्दी बंदूक का लाइसेंस चाहने वालों के लिए लागू की जा सकती है? निश्चित रूप से फिल्मी सितारों पर भी यह बात लागू होगी...!!इसी साल सोहा अली खान के बारे में खबर थी कि गुडग़ांव प्रशासन ने उन्हें 18 की उम्र में बंदूक का लाइसेंस दिया था। जबकि कानून में 21 से पहले ऐसे हथियारों के लाइसेंस की मनाही है। बात हाई-प्रोफाइल थी, सो बिना तूल के मामला निपटा लिया गया। देश में रईसों के बिगडैलों की खबरें कम नहीं आतीं। वैसे देखा यही गया है कि फिल्मी सितारे सफलता का नशा संभाल नहीं पाते। उस पर यदि वे खुलेआम पिस्तौल लेकर घूमेंगे और उनसे युवा प्रभावित होंगे, तो समाज का क्या होगा? वास्तव में, नेता-अभिनेता तो सुरक्षा का सामान साथ लेकर चल सकते हैं। परंतु आम आदमी क्या करे जो सडक़ पर खुला चलता है। हिंदी की वर्तमान कविता के प्रमुख हस्ताक्षर राजेश जोशी ने लिखा है-सबसे बड़ा अपराध है इस समय/निहत्थे और निरपराध होना/जो अपराधी नहीं होंगे/मारे जाएंगे...।बीती सदी के आखिरी वर्षों में लिखी गई इन पंक्तियों में आम आदमी की जो लाचारी झलकती थी। वही अब भी झलक रही है।

Thursday, December 4, 2008

बचाएं इस रियेलिटी से


बीते हफ्ते मुंबई को करीब 60 घंटों तक बंधक बनाए रखने वाली आतंकी दुर्घटना को क्या आप बड़े परदे पर देखना चाहेंगे? यह सवाल खुद के पूछने का है। मुंबई में जो कुछ हुआ, लोग अपने ढंग से उसकी व्याख्या कर रहे हैं। कोई देश/राजनीति/सुरक्षा तंत्र के लिए इसे शर्मनाक बता रहा है, तो कोई इसे आतंकियों को पोसने वाले पड़ोसी पाकिस्तान को करारा जवाब देने का मौका। किसी के लिए यह पूरा घटनाक्रम राजनीतिक रोटियां सेंकने वाला तंदूर है, तो किसी के लिए सबक लेने का पाठ्यक्रम। मुंबई की गोद में बैठे बॉलीवुड के लिए यह घटना उसे उधेड़बुन में डालने वाली है। कोई और मौका होता, तो इंडस्ट्री के तमाम 'भट्ट' अब तक इस विषय पर तत्काल 'रियलिस्टिक' फिल्म बनाने की घोषणा कर देते। मुंबई के 1993 में हुए बम धमाके, उसके बाद दंगे, मुंबई का अंडरवल्र्ड, मुंबई पर बारिश का बेरहम कहर, मुंबई की लोकल टे्रनों में बम ब्लास्ट... इन सब पर फिल्म बनाने से खूब पब्लिसिटी मिलती है। परंतु इस बार मामला काफी संवेदनशील है और कोई इस पर फिल्म बनाने की बात करके लोगों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता। इससे पहले कि कोई फिल्मकार एक शब्द कहता, एक एसएमएस लोगों के पास पहुंच गया। जो कह रहा है, 'हम महेश भट्ट, राम गोपाल वर्मा, संजय गुप्ता, राहुल ढोलकिया और अपूर्व लखिया जैसों से पूरी विनम्रता से अपील करते हैं कि मुंबई में जो हो रहा है, वह बहुत भयावह और दुखद है। इस पर 'रियलिस्टिक' फिल्म बना कर इसे भव्यता प्रदान न करें।' अंत में यह संक्षिप्त संदेश यह भी कहता है, 'भगवान हमारे देश को इन आतंकियों और ऐसे फिल्मवालों से बचाए।'वैसे निर्माता-निर्देशक रामगोपाल वर्मा जाने क्या सोच कर महाराष्ट्र के अब कुर्सी खो चुके मुख्यमंत्री, विलास राव देशमुख और उनके अभिनेता बेटे, रितेश देशमुख के साथ ताज महल होटल में आतंकियों द्वारा मचाई तबाही देखने चले गए। मीडिया ने इसे उनका 'टैरर टूरिज्म' करार दिया!! क्यों...? क्योंकि रामू 'रियलिस्टिक' फिल्में बनाते हैं और उन्हें ताज में देखते ही अनुमान लगा लिया गया कि वे मुंबई पर हुए आतंकी हमले पर फिल्म बनाने की तैयारी में हैं। रामू और तत्कालीन मुख्यमंत्री दोनों की फजीहत हो गई। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि यदि मुख्यमंत्री के साथ ताज में अमिताभ बच्चन होते, तो क्या यह नहीं कहा जाता कि वे मुंबई के जिम्मेदार और वरिष्ठ नागरिक हैं! मुंबई की स्थिति से वे चिंतित हैं, इसीलिए मुख्यमंत्री के साथ गए...? क्या रामू के मामले में निष्कर्ष निकालने में मीडिया ने जल्दबाजी की?रामू पर सवाल उठाने वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी कठघरे में है। जिस तरह से उसने 'युद्ध' लाइव दिखाया, उससे आतंकियों और उनके आकाओं को पल-पल घटनास्थलों की जानकारी मिल रही थी! इससे पुलिस और सेना का काम मुश्किल हुआ। परंतु इस सीधे प्रसारण ने बॉलीवुड को भी संकट में डाला है। लाइव कवरेज के बाद बॉलीवुड के पास ज्यादा कुछ इस विषय पर कहने को नहीं रह गया है। दूसरे, जिस तरह से लोगों ने घर बैठे सब देखा, उससे देश के सैकड़ों दुश्मनों से अकेले निपट लेने वाले फिल्मी नायक की छवि ध्वस्त हो गई है। सबने देख लिया है कि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में हीरो, शहीद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन जैसे बनते हैं। किसी फिल्मी खान, दत्त या रोशन की तरह नहीं। निश्चित मानिए कि यह घटना फिल्म बनाने वालों के सामने यह चुनौती पेश करेगी कि भविष्य में वह अपने ऐक्शन हीरो को किस तरह से जांबाज दिखाएं?

Tuesday, December 2, 2008

सलमान का चुटकुला


असली दुश्मनी यही है कि अपनी विफलता का गम कम हो और दुश्मन की सफलता का दर्द ज्यादा!! सलमान खान इन दिनों ऐसे ही दर्द भरे दौर से गुजर रहे हैं। इसीलिए वे ऐसी बातें भी कर रहे हैं कि सुनने वालों को लगे कि उन्हें दौरा तो नहीं पड़ गया? बीते शुक्रवार को रिलीज हुई निर्देशक सुभाष घई की 'युवराज' का टिकट खिडक़ी पर बुरा हाल किसी से छुपा नहीं है। सलमान फिल्म के मुख्य सितारे थे। ऐसे में उनको गमगीन होना ही चाहिए। परंतु सलमान को अपनी फिल्म को मिले बुरे रेस्पॉन्स से ज्यादा तकलीफ इस बात की है कि उनके कट्टर दुश्मन, जॉन अब्राहम को लोगों ने 'दोस्ताना' में पसंद किया। जॉन ने फिल्म में जमकर जिस्म दिखाया है और देखने वाले उनसे खुश हैं। फिल्म की रिलीज के दौरान जॉन ने एक सिने-पत्रिका के लिए लगभग न्यूड फोटोसेशन भी कराया था। जो हिट रहा। 'दोस्ताना' में समलैंगिक रिश्तों को जिस हल्के-फुल्के ढंग से दिखाया गया है, उससे जॉन-अभिषेक समाज के ऐसे मर्दों में पहले से कहीं लोकप्रिय हो गए हैं। परंतु यह लोकप्रियता सलमान को नहीं पच रही।अभिषेक को लेकर तो सलमान कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि बच्चन परिवार से उनके सदा ठीकठाक रिश्ते रहे हैं और उनकी पूर्व पे्रमिका, ऐश्वर्य अब इसी घराने की बहू है। सो, सलमान के कहे का लोग जो मतलब न लें, वही कम होगा। अत: सलमान की सारी नाराजगी जॉन पर टूटी है। बॉलीवुड के अंदरूनी हलकों में 'दोस्ताना' की लोकप्रियता पर सलमान की टिप्पणी चर्चा में है। सलमान के अनुसार, जॉन ने इस फिल्म में जिस तरह से कपड़े उतार कर अद्र्धनग्न सीन दिए, वे नहीं देने चाहिए थे। ...मगर क्यों? सलमान का तर्क है कि जॉन को खयाल रखना चाहिए कि घर-परिवारों की मां-बेटियां-बहनें भी फिल्में देखने जाती हैं।अब सलमान के मुंह से यह सुनकर कौन नहीं हंसेगा? वाकई सलमान का यह खयाल इस साल का सबसे बड़ा चुटकुला है। मामला साफ-साफ सौ सौ चूहे खाने वाली बिल्ली के हज पर जाने का है!! सलमान जानबूझ कर यह भूलने की कोशिश में हैं कि बॉलीवुड में नायकों को परदे पर शर्ट उतारने का चस्का उन्होंने ही लगाया। वे आज भी बॉलीवुड के सबसे लोकप्रिय पोस्टर बॉय हैं। 'मुझसे शादी करोगी' और 'पार्टनर' जैसी फिल्मों के गानों में आज भी आप घर बैठे छोटे परदे के म्युजिक चैनलों पर सलमान को अपनी छाती फुलाते देख सकते हैं। सिक्स पैक ऐब्स का नशा भी सलमान की देन है। यह बात अलग है कि बदले जमाने के साथ परदे पर शर्ट उतारने की, हमारे नायकों की झिझक खत्म हो गई है। ऐसे में सलमान को टक्कर मिलना स्वाभाविक है। अक्षय कुमार, सैफ अली खान, ऋतिक रोशन और शाहरुख खान से लेकर आमिर खान तक बिना-शर्ट मैदान में हैं। लेकिन सलमान की जॉन से पुरानी दुश्मनी है और इस बार जॉन से टक्कर में सलमान पिट गए। अत: उनका खीझना स्वाभाविक है। सलमान की आदत है कि उनके दिल में जो रहता है, वह तत्काल जुबान पर ले आते हैं। सो, इस बार जो उनकी जुबान से जो निकला, वो किसी चुटकुले से कम नहीं!!

Wednesday, November 26, 2008

चोरी, हेराफेरी और सीनाजोरी


2 ताजातरीन मामलों पर बॉलीवुड की नजरें हैं। पिछले साल की हिट 'ओम शांति ओम' और अगले हफ्ते रिलीज होने वाली 'ओए लकी, लकी ओए'। दोनों फिल्में चोरी, हेराफेरी और सीनाजोरी के मामलों से दो-चार हो रही हैं। शाहरुख खान के प्रोडक्शन करियर में सफलता का कोहिनूर साबित हुई 'ओम शांति ओम' की चमक धीमे-धीमे फीकी पड़ी है। पहले तो फिल्म में सीनियर ऐक्टर मनोज कुमार के अपमान के मामले ने कई लोगों को नाराज किया और फिर फिल्म पर चोरी की कहानी होने के आरोप लगे। 'कारपोरेट' और 'फैशन' लिखने वाले अजय मोंगा ने 'ओएसओ' की कहानी पर अपना दावा पेश किया है उनके मुताबिक यह फिल्म उनकी लिखी स्क्रिप्ट 'द साइलेंट मूवी' पर बनाई गई है। लेखक ने मुंबई में फिल्मी लेखकों के विवादों को सुलझाने वाली संस्था फिल्म राइटर्स एसोसिएशन में यह दावा पेश किया था। न्याय नहीं मिला, तो लेखक को अदालत की शरण लेना पड़ी। मामला मुंबई हाईकोर्ट में है। अत: लेखक संगठन की आंखें भी खुली है। वह गंभीरतापूर्वक मोंगा की स्क्रिप्ट को पढ़ कर मान रहा है कि निर्देशक फराह खान की फिल्म का कम से कम पहला हिस्सा तो बहुत कुछ 'द साइलेंट मूवी' की नकल है। तय है कि अदालत में लेखक संगठन के प्रतिनिधियों की गवाही से किंग खान के प्रोडक्शन हाउस, रेड चिलीज को मिर्ची लग सकती है!! संभव है कि अब ऊंट पहाड़ के नीचे आए और जो शाहरुख-फराह मोंगा को मुलाकात के वक्त देने से कतरा रहे थे, वे अदालत के बाहर मोटी 'डील' का प्रस्ताव रखें। संगीत निर्देशक राम संपत की बनाई कुछ सेकेंड की धुन चुराने के चक्कर में फिल्म 'के्रजी4' के निर्माता राकेश रोशन को अदालत की चौखट पर खड़े-खड़े करीब 2 करोड़ रुपये देने पड़े थे। ऐसे में यहां तो मामला उस फिल्म की स्क्रिप्ट उड़ा लेने का है, जिसकी कमाई का ठीक-ठीक हिसाब शायद शाहरुख भी नहीं रख पाए हों।असल में हिंदी सिनेमा की कॉमर्शियल दुनिया ऐसी काजल की कोठरी बन चुकी है, जहां किसी भी फिल्म का बिना दागदार हुए निकलना मुश्किल है। इधर फिल्म का नाम लीजिए, उधर लोग बता देंगे कि यह आइडिया किस देसी-विदेशी फिल्म से लिया गया है। यदि ऐसा नहीं, तो कोई गुमनाम लेखक निकल आएगा, कहानी पर दावा करता हुआ। हालिया रिलीज 'दोस्ताना' (हॉलीवुड की पिछले साल रिलीज हुई फिल्म 'आई नाऊ प्रोनाउंस यू चक ऐंड लैरी') हो या फिर पिछले कुछ सालों में आई दर्जनों फिल्में। अगले हफ्ते सिनेमा घरों में आने वाली निर्देशक दिबाकर बनर्जी की 'ओए लकी...' भी झटके खा रही है। दिल्ली जेल में बंद सुपर चोर कहे जाने वाले देवेंदर सिंह उर्फ बंटी ने फिल्म की प्रोड्यूसर कंपनी यूटीवी को पत्र लिख कर दावा किया है कि यह फिल्म उसकी जिंदगी पर आधारित है और उसे इसके मुनाफे में हिस्सा चाहिए। सुपर चोर मामले को अदालत में ले जाने की भी धमकी दे रहा है। रिलीज से पहले कोई निर्माता अदालत का दरवाजा नहीं देखना चाहता। उल्लेखनीय है कि सुपर चोर के बारे में विख्यात है कि वह सिर्फ शौकिया चोरी करती है और उसे इसका नशा है। चोरी के लिए वह ऐसे-ऐसे आइडिये लाता है कि पुलिस भी उसकी कायल है। लेकिन निश्चित रूप से बॉलीवुड के कथा-चोरों के बारे में यह बात कोई दावे से नहीं कह सकता। जो चोरी और हेराफेरी तो करते हैं... साथ ही सीनाजोरी भी।

Saturday, September 13, 2008

वक्त वक्त की बात


किसी जमाने में फिल्म समीक्षकों और फिल्म मीडिया को दुश्मन की निगाहों से देखने वाले प्रोड्यूसर अब उनकी तारीफ को अपने लिए मैडल की तरह लिए घूम रहे हैं। मामला है एक्सल एंटरटनेमेंट नाम की कंपनी वालों का, जिन्होंने दो साल पहले शाहरुख खान को लेकर 'डॉन' बनाई थी। उस वक्त समीक्षकों ने 1978 की 'डॉन' (अमिताभ बच्चन) की इस रीमेक की धज्जियां उड़ा दी थीं। तब प्रोड्यूसरों तथा डायरेक्टर फरहान अख्तर समेत शाहरुख के चेहरे से रौनक गायब हो गई थी। चारों ओर होने वाली आलोचनाओं से तिलमिलाए प्रोड्यूसरों-डायरेक्टरों और ऐक्टर ने मिल कर तत्काल मीडिया में एक बड़ा-सा, बहुचर्चित विज्ञापन रिलीज किया था। जिसकी टैग लाइन थी, 'डॉन के क्रिटिक्स की सबसे बड़ी गलती ये है कि वे डॉन के क्रिटिक हैं।' परंतु अब वक्त बदल गया है। इसी प्रोड्क्शन हाउस की फिल्म 'रॉक ऑन' कुछ दिनों पहले रिलीज हुई है और महानगरीय संस्कृति में पले-बढ़े चुनिंदा समीक्षकों ने इसकी तारीफ में कुछ पंक्तियां लिख दी हैं। परिणाम यह कि इन पंक्तियों को प्रोड्यूसरों ने फिल्म की रिलीज के बाद के विज्ञापनों में इस्तेमाल किया है, ताकि दर्शकों को आकर्षित कर सकें। जबकि हकीकत यह है कि फिल्म किसी लिहाज से देखने काबिल नहीं है। फिल्म में न तो ढंग का संगीत है और न ही ढंग की कहानी। परंतु 'मैट्रो' के चुनिंदा समीक्षकों की तारीफ को आधार बना कर प्रोड्यूसर दुनिया को बताने की कोशिश में लगे हैं कि वे एक महान फिल्म दर्शकों के बीच लाए हैं।वाकई समीक्षकों के बारे में राय बदलते फिल्म वालों को वक्त नहीं लगता। उनका पैमाना बहुत सरल है। यदि उनकी फिल्म को अच्छा लिख दिया, तो समीक्षक अच्छे, बुरा लिखा तो समीक्षक बुरे। हालांकि कुछ निर्माता-निर्देशक अपने को इन अच्छी-बुरी समीक्षकाओं से ऊपर उठा हुआ मानते हैं, परंतु इसमें संदेह नहीं कि समीक्षकों का भूत उन्हें अकेले में डराता है। उन्हें भले ही सैकड़ों लोग कहें कि उन्होंने बढिय़ा फिल्म बनाई है, परंतु वे एक समीक्षक की राय सुनने को उत्सुक रहते हैं। क्या उसे फिल्म पसंद आई...? यदि नहीं, तो उनका चैन खोते वक्त नहीं लगता। 'रॉक ऑन' से बढिय़ा उदाहरण नहीं हो सकता। जबकि दो साल पहले इन्हीं लोगों के लिए समीक्षक 'तुच्छ' थे। परंतु अब वे महत्वपूर्ण हो गए हैं और उनकी लिखी पंक्तियां फिल्म के पोस्टरों पर छापी जा रही हैं।असल में अमिताभ बच्चन हों, चोपड़ा कैंप हो, राम गोपाल वर्मा हों या फिर कोई शर्मा ही क्यों नहीं..., सबके लिए समीक्षकों की राय महत्व रखती है और वे सिर्फ तारीफ की उम्मीद करते हैं। 'रॉक ऑन' का ही अगला मामला यह है कि वे मीडिया से मदद की उम्मीद कर रहे हैं। संगीत की बिक्री से साप्ताहिक आंकड़े कह रहे हैं कि पिछले ही हफ्ते रिलीज हुए टी-सीरिज की फिल्म 'कर्ज' (हिमेश रेशमिया) के म्युजिक ने 'रॉक ऑन' को महानगरों की बिक्री में पछाड़ दिया है। अब एक ही हफ्ते में यह कैसे संभव है? 'रॉक ऑन' की टीम चाहती है कि मीडिया इसे मुद्दा बनाए, पर्दाफाश करे। ताकि उनकी फिल्म को चर्चा मिले और दर्शक फिल्म देखने जाएं। सचमुच यह बात कुछ हजम नहीं हुई।

Wednesday, September 10, 2008

तनुश्री का सेंसेक्स

यह सही है कि जिस डाल पर आप बैठे हैं, वह टूट भी सकती है। परंतु आश्चर्य तो तब हो, जब आप खुद ही उस डाल को काटने लगें, जिस पर बैठे हैं। कहते हैं कि कवि कालिदास ने कभी ऐसा ही किया था। परंतु तब वे मूर्ख शिरोमणि थे। लेकिन अब जबकि तनुश्री दत्ता यह काम कर रही हैं, उन्हें क्या कहा जाए? उनकी फिल्म 'सास बहू और सेंसेक्स' आने वाली है। परंतु तनुश्री इस फिल्म के बारे में बात करते हुए यह जरूर कहती हैं कि इस फिल्म की डायरेक्टर में इतनी काबीलियत नहीं कि वह हिट फिल्म दे सके। यह क्या बात हुई...? डायरेक्टर को फिल्म नाम के जहाज का कप्तान कहा जाता है। जब कप्तान में भरोसा ही नहीं था, तो तनुश्री ने यह सवारी क्यों की? कारण यह कि इस फिल्म के बहाने तनुश्री को इंटरनटेशनल प्रोड्यूसरों के साथ काम करने का मौका मिल रहा था। यह फिल्म हॉलीवुड कंपनी वार्नर ब्रदर्स ने बनाई है। फिल्म तैयार है और इन दिनों इसे लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रचार किया जा रहा है। परंतु तनुश्री के अनूठे अंदाज ने फिल्म से जुड़े लोगों की सांस आफत में डाल दी है। तनुश्री की बात पर भरोसा कर लें कि डायरेक्टर काबिल नहीं, तो तय है कि 'सास बहू और सेंसेक्स' बॉक्स ऑफिस पर डूब ही जाएगी! इस फिल्म को शोना उर्वशी ने डायरेक्ट किया है, जिनकी पहली फिल्म 'चुपके से' बुरी तरह फ्लॉप रही थी।यह कोई पहली बार नहीं कि ऐक्टर अपने डायरेक्टर से नाराज है। नाराजगी होती है, परंतु कम से कम फिल्म की रिलीज से पहले कोई उसे व्यक्त नहीं करता। पहले सारा फील गुड पेश किया जाता है। रिलीज के बाद गुड़ गोबर सामने आता है। ताजा उदाहरण मल्लिका शेरावत का है। वे 'मान गए मुगल-ए-आजम' की रिलीज से पहले संजय छैल को बेहतरीन निर्देशक बता रही थीं। परंतु अब वे पानी पी पी कर डायरेक्टर को कोस रही हैं। डायरेक्टर को अपने हुजूर में सफाई पेश करने तक का मौका नहीं दे रहीं। छैल के एसएमएस संदेशों का कोई जवाब मल्लिका की ओर से नहीं आ रहा।लेकिन तनुश्री के पारे का सेंसेक्स फिल्म की रिलीज से पहले ही उछल रहा है और वे जम कर उर्वशी की बुराई कर रही हैं। असल में, फिल्म की मेकिंग के दौरान ही दोनों में खटपट शुरू हो गई थी क्योंकि यह पूर्व मिस इंडिया, शोना के काम करने के तरीके से नाखुश थी। शोना ही बहन, मासूमी भी फिल्म में है। तनुश्री को पूरे वक्त यह लगता रहा कि शोना अपनी बहन के रोल पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, उनके रोल पर नहीं। इर्ष्या की यह चिंगारी अब आग की तरह भडक़ रही है। वैसे तनुश्री का यह तीखी मिर्ची वाला अंदाज नया नहीं है। उनकी पहली फिल्म 'चॉकलेट' के डायरेक्टर, विवेक अग्निहोत्री से लेकर नाना पाटेकर जैसे सीनियर ऐक्टर और गणेश आचार्य जैसे कोरियोग्राफर तक तनुश्री से कई बार खरी खरी सुन चुके हैं। परंतु यह मौका थोड़ा अलग है। फिल्म की रिलीज से पहले ही वे उसका बंटाधार किए दे रही हैं! यदि बांगला ब्यूटी का यही अंदाज जारी रहा, तो उनके करियर के सेंसेक्स का तीर आखिर कब तक आसमान की दिशा मे नजर आएगा?

Thursday, September 4, 2008

बॉलीवुड का स्वर्णिम दौर


बॉलीवुड सिनेमा के आर्थिक पक्ष पर चर्चा करना अब वक्त खराब करने से कम नहीं। सही आंकड़े कोई प्रोडक्शन हाउस जारी नहीं करता। सितारे अपनी फीस झूठ बताते हैं। कमाते पंद्रह हैं, बताते पचास हैं। हिट का गणित भी ऐंद्रजालिक है...। जिस फिल्म को समीक्षक फ्लॉप बताते हैं, उसके रिलीज होने के दूसरे-तीसरे दिन ही शहरों में फिल्म के पोस्टर चिपके होते हैं, सुपर हिट!! क्या झूठ मानिए, क्या सच...? खुद सिनेमावाले इस पर एकमत नहीं दिखते। परंतु इसमें संदेह नहीं कि हिंदी सिनेमा ऐसे दौर से गुजर रहा है, जिसमें धन की बाढ़ आई हुई है, जो बिहार की जल-बाढ़ के विपरीत कहीं सुखदायी है। अत: अब सिनेमा के आर्थिक मसले की चर्चा हो, तो उसके सुखद पक्ष पर ही हो सकती है। वह भी अतिशयोक्ति की तरह। जितनी अतिशयोक्ति, उतनी बढिय़ा चर्चा। करोड़ का आंकड़ा अब फिल्म में निर्माण में अपना जादू खो चुका है। फिल्म मेकिंग में अब 25 और 50 के बाद फिल्में 100 करोड़ की बात करने लगी हैं। हालांकि अब भी यह हॉलीवुड से काफी कम बताया जाता है। बॉलीवुड जिस आर्थिक स्वर्णिम दौर से गुजर रहा है, उसे देखते हुए टे्रड पंडितों का यही मानना है कि वह दिन दूर नहीं, जब बॉलीवुड में हर साल कम से कम 50 से 100 ऐसी फिल्में बनेंगी, जो 50 से 100 करोड़ के बजट की होंगी। फिलहाल यह अतिशयोक्ति लगे, परंतु सचमुच ऐसा वक्त आने लगा है। कारण...? प्रोड्यूसर अब पूरी दुनिया में फैल चुके बॉलीवुड फिल्मों के बाजार को देख कर गणित बैठाते हैं। वह दौर नहीं रहा कि सिर्फ मुंबई में चलने से फिल्म हिट कहलाएगी।प्रोड्यूसरों ने फिल्मों की लागत क्षमता का बढऩा मंजूर किया है, तभी निर्देशकों, ऐक्टरों और तकनीशियनों की फीस बहुत मोटी हो चुकी है। मामला तो यहां तक है कि हिट होने के बाद डायरेक्टर और ऐक्टर फिल्म के निर्माण में मुनाफा हासिल करते हैं और कई बार खुद भी प्रोड्यूसर हो जाते हैं। निर्देशक आशुतोष गोवारिकर, मधुर भंडारकर, विशाल भारद्वाज कुछ चुनिंदा उदाहरण हैं। ऐक्टरों में देखें, तो शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान, ऋतिक रोशन के बाद अब सैफ अली खान की फिल्म निर्माण में लग गए हैं। सभी सितारे फिल्मों में काम करने की मोटी फीस तो लेते हैं, साथ ही प्रोड्यूसर के मुनाफे में हिस्सा भी।रोचक तथ्य यह है कि फिल्म का निर्माण करने वालों में उन लोगों का भरोसा बढ़ा है, जो फिल्मों के लिए धन एडवांस में जारी करते हैं। बीच में वह वक्त चला गया था, जब वितरक निर्माणाधीन फिल्मों के रशेज देख कर प्रोड्ूयूसर को एडवांस पैसा देते थे। परंतु यह वक्त फिर लौट आया है। अब तो स्थिति यह है कि कुछ मामलों में फिल्म घोषित हुई और वितरक ने कई करोड़ में अधिकार खरीद लिए, विश्व वितरण के। क्या फिल्म बनेगी, कैसी बनेगी...? सोचा भी नहीं। हाल में बॉलीवुड में ऐसा सबसे बड़ा सौदा हुआ, जब वितरक कंपनी स्टूडियो 18 ने विपुल शाह के निर्देशन में बनने वाली फिल्म 'लंदन ड्रीम्स' (सलमान खान, अजय देवगन) के अधिकार 120 करोड़ रुपये में खरीदे। फिल्म शुरू भी नहीं हुई और प्रोड्यूसर ने मोटा मुनाफा कमा लिया। अब इससे बढ़ कर स्वर्णकाल की नजीर क्या हो सकती है?